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Events & Programes

Every year we celebrate Bhado Amavas Utsav at Shree Narayani Dham temple (Pune). Celebration spans over 2 days – Choudas and Amavas in the month of Bhadrapad. Importance of Bhadi Amavas Utsav – Shree Rani Satiji became Sati in Samvat 1352 (Mangsir month, Krishna Paksha Navmi and Tuesday). From that time, Shree Rani Satiji is worshipped as incarnation of Shakti. Shree Rani Satiji is worshipped as Devi Maa by people of all religion regardless of their caste, creed, age, nationality. After Rani Satiji, there have been 12 more Satis in the same tradition whose names are Thus in the family history of Shree Jaliramji, first Sati was Shree Ranisati (on Mangsir Badi Navmi) and last Sati was Shree Gujari Sati on Bhadrapada Amavas. Thus all the tradition of Shaktis is celebrated on the Bhadrapada Amavas. This is in honor of all the Shaktis which happened in the family of Shree Jaliramji. This is the reason for Jat and Dhok pujan on Bhadi Amavas. On this day, our ancestors (Pitraji) are also worshipped through Jat. Our Narayani Dham Katraj temple is celebrating this festival spread over 2 days. On the first day ie Choudas Mangal Path is chanted with devotion by all devotees followed by Aarti, Prasad. Beautiful decoration and shringar makes it even more attractive. On the day of Amavas, Puja arrangements are available for all the devotees. Other activities include Abhishek, Chappan Bhog, Bhajans, Prasadam. Devotees engage themselves in various seva through their generous donation.
Narayanidevi as a child was born on Kartik Shukla Navmi. On this day, we celebrate birthday of Shree Narayanidevi as a child with Deepotsav and Annakut Prasad.

श्री राणी सत्यै नमः

या देवी सर्व भूतेशु सति रुपेणी संस्थिता । नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नारायणी नमोसतुते ॥

( बुद्धिरुप से सब लोगो के ह्लदय में विराजमान रहने वाली तथा स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली नारायणी देवि तम्हे नमस्कार है ।)
आज श्री राणी सती दादीजी का जन्म दिवस है| झुंझुनू एवं पुरे भारत में श्री राणी सती दादी का जन्मदिन उत्सव बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। लाखो श्रद्धालु इस शुभ दिन पर झुंझुनू के मंदिर परिसर में श्री राणी सती दादी जी की एक झलक पाने के लिए घंटो खड़े रहते हैं|
माँ नारायणी का परिचय
संवत् तेरह सौ अडतीस कार्तिक शुक्ला मंगलवार । बारह बजकर दस मिनट, आधे रात लिया अवतार ।

(सती मंगल से)
माँ नारायणी का जन्म वैश्य जाती के अग्रवाल वंश में हरियाणे में धनकुबेर सेठ श्री घुरसमाल जी गोयल के सं १३३८ वि कार्तिक शुक्ला ८ शुभ मंगलवार रात के १२ बजे पश्चात हरियाणे की प्राचीन राजधानी ‘महम’ नगर के ‘ढ़ोकवा’ उपनगर में हुआ था| इनका नाम ‘नारायणी’ बाई रखा गया था| वह बचपन से धार्मिक व सतियों वाले खेल सखियों के साथ खेला करती थी और कथा आदि में विशेष रूचि लेती थी। बड़ी होने पर सेठजी ने इन्हे धार्मिक शिक्षा, शस्त्र शिक्षा, घुड़सवारी आदि की भी शिक्षा दिलाई थी जिसमे उन्होंने प्रवीणता प्राप्त कर ली थी। कहते हैं कि उस समय हरियाणा में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण उत्तर भारत में भी उनके मुकाबले कोई निशानेबाज नहीं था|

On this day, Shree Rani Satiji went Satiji. Hence this day is celebrated as Dadiji’s Janmotsav

परम आराध्य श्री दादी जी के प्रताप उनके वैभव व अपने भक्तों पर निःस्वार्थ कृपा बरसाने वाली “माँ नारायाणी” को कौन नही जानता | भारत में ही नही विदेशों में भी इनके भक्त और उपासक हैं|
पौराणिक इतिहास से ग्यात होता है की महाभारत के युद्ध में चक्रव्यूह में वीर अभीमन्यु वीर गति को प्राप्त हुए थे | उस समय उत्तरा जी को भगवान श्री कृष्णा जी ने वरदान दिया था की कलयुग में तू “नारायाणी” के नाम से श्री सती दादी के रूप में विख्यात होगी और जन जन का कल्याण करेगी, सारे दुनिया में तू पूजीत होगी | उसी वरदान के स्वरूवप श्री सती दादी जी आज से लगभग 715 वर्ष पूर्वा मंगलवार मंगसिर वदि नवमीं सन्न 1352 ईस्वीं 06.12.1295 को सती हुई थी |

जन्म – श्री दादी सती का जन्म संवत 1638 वि. कार्तिक शुक्ला नवमीं दिन मंगलवार रात १२ बजे के पश्चात डोकवा गाँव में हुआ था | इनके पिता का नाम सेठ श्री गुरसामल जी था |

बचपन - इनका नाम नारायाणी बाई रखा गया था | ये बचपन में धार्मिक व सतियो वाले खेल खेलती थी | बड़े होने पर सेठ जी ने उन्हे धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ शस्त्र शिक्षा व घुड़सवारी की शिक्षा भी दिलाई थी | बचपन से ही इनमे दैविक शक्तियाँ नज़र आती थी, जिससे गाँव के लोग आश्चर्य चकित थे |

विवाह – नारायाणी बाई का विवाह हिस्सर राज्य के सेठ श्री ज़ालीराम जी के पुत्रा तनधन दास जी के साथ मंगसिर शुक्ला नवमीं सन्न 1352 मंगलवार को बहुत ही धूम धाम से हुआ था |

तनधन जी का इतिहास – इनका जन्म हिस्सार के सेठ ज़ालीराम जी के घर पर हुआ था | इनकी माता का नाम शारदा देवी था | छोटे भाई का नाम कमलाराम व बहिन का नाम स्याना था | ज़ालीराम जी हिस्सार में दीवान थे | वहाँ के नॉवब के पुत्र और तनधन दास जी में मित्रता थी परंतु समय व संस्कार की बात है, तनधन दास जी की घोड़ी शहज़ादे को भा गयी | घोड़ी पाने की ज़िद से दोनो में दुश्मनी ठन गयी | घोड़ी छीनने के प्रयत्न में शहज़ादा मारा गया | इसी हादसे से घबरा कर दीवान जी रातो रत परिवार सहित हिस्सर से झुनझुनु की ओर चल दिए | हिस्सर सेना की ताक़त झुनझुनु सेना से टक्कर लेने की नही थी | दोनो शाहो में शत्रुता होने के कारण ये लोग झुनझुनु में बस गये |

मुकलावा – मुकलावे के लिए ब्राह्मण के द्वारा दीवान साहब के पास निमंत्रण भेजा गया | निमंत्रण स्वीकार होने पर तनधन दास जी राणा के साथ कुछ सैनिको सहित मुकलावे के लिए “महम” पहुँचे | मंगसिर कृष्णा नवमीं सन्न 1352 मंगलवार प्रातः शुभ बेला में नारायाणी बाई विदा हुई |

परंतु होने को कुछ और ही मंजूर था | इधर नवाब घात लगाकर बैठा था | मुकलावे की बात सुनकर सारी पहाड़ी को घेर लिया | “देवसर” की पहाड़ी के पास पहुँचते ही सैनिको ने हमला कर दिया | तनधन दास जी ने वीरता से डटकर हिस्सारी फ़ौजो का सामना किया | विधाता का लेख देखिए पीछे से एक सैनिक ने धोके से वार कर दिया, तनधन जी वीरगति को प्राप्त हुए |
नई नवेली दुल्हन ने डोली से जब यह सब देखा तो वह वीरांगना नारायाणी चंडी का रूप धारण कर सारे दुश्मनो का सफ़ाया कर दिया | झडचन का भी एक ही वार में ख़ात्मा कर दिया | लाशो से ज़मीन को पाट दिया | सारी भूमि रक्त रंजीत हो गयी | बची हुई फौज भाग खड़ी हुई | इसे देख राणा जी की तंद्रा जगी, वे आकर माँ नाराराणी से प्रार्थना करने लगे, तब माता ने शांत होकर शस्त्रों का त्याग किया | फिर राणा जी को बुला कर उनसे कहा – मैं सती होउंगी तुम जल्दी से चीता तय्यार करने के लिए लकड़ी लाओ | चीता बनने में देर हुई और सूर्या छिपने लगा तो उन्होने सत् के बल से सूर्या को ढलने से रोक दिया | अपने पति का शव लेकर चीता पर बैठ गई | चुड़े से अग्नि प्रकट हुई और सती पति लोक चली गयी | चीता धू धू जलने लगी | देवताओं ने गदन से सुमन वृष्टि की |

वरदान – तत्पश्चात चीता में से देवी रूप में सती प्रकट हुई और मधुर वाणी में राणा जी से बोली, मेरी चीता की भस्म को घोड़ी पर रख कर ले जाना, जहाँ ये घोड़ी रुक जाएगी वही मेरा स्थान होगा | मैं उसी जगह से जन-जन का कल्याण करूँगी | ऐसा सुन कर राणा बहुत रुदन करने लगा | तब माँ ने उन्हे आशीर्वाद दिया की मेरे नाम से पहले तुम्हारा नाम आएगा “रानी सती” नाम इसी कारण से प्रसीध हुआ | घोड़ी झुनझुनु गाँव में आकर रुक गयी | भस्म को भी वहीं पघराकर राणा ने घर में जाकर सारा वृतांत सुनाया | ये सब सुनकर माता पिता भाई बहिन सभी शोकाकुल हो गये | आज्ञनुसार भस्म की जगह पर एक सुंदर मंदिर का निर्माण कराया | आज वही मंदिर एक बहुत बड़ा पुण्य स्थल है, जहाँ बैठी माँ “रानी सती दादी जी” अपने बच्चो पर अपनी असीम अनुकंपा बरसा रही है | अपनी दया दृष्टि से सभी को हर्षा रही है |

“जगदंबा जग तारिणी, रानी सती मेरी मात| भूल चूक सब माफ़ कर, रखियो सिर पर हाथ||”

This is the Wedding day of Dadiji. We celebrate this day with lot of devotion, enthusiasm at Shree Narayani Dham temple Pune
This is a holy month which usually comes in December-January. It is said that all good work, chanting, bhajans done during this period gives multiplying effect. At the temple, we have Bhajans everyday from 8am to 9am followed by Prasadam. Lot of devotees use this opportunity to offer prayers to the Devima.
Shree Narayani Dham temple was installed on 2002 in the month of Maagh (approx. Feb) on the day of Shukla Dashmi. On this done, temple organizes various social, cultural activities like Blood Donation, Free Health check up, Social awareness and spiritual upliftment.
During this month of Phalgun, Holi is celebrated using traditional method. We play Holi with flowers and Chandan
In the month of Chaitra, Gangour Pujan is celebrated on Shukla Teej day. Temple provides all necessary arrangements for the ladies to worship the Gangour Pujan
Both NavRatris (Chaitra and Ashwin) are celebrated with worship of Devi maa. Bhajans, Chanting, Havan are done with full devotion. Devotees can also celebrate their birthday, anniversary or any special occasion at the temple and take blessings of Dadiji.
On the full moon day (Purnima) of Chaitra month, Hanuman Jayanti is celebrated with Akhand Ramayan Path followed by Prasad (Bhandara) for all devotees.